Eesawad aur Purvottar Bharat Ka Sanskritik Sanhar

byDr. Shailendra Kumar

Documents Christianity's expansion across northeast India's seven states and its impact on indigenous cultures and constitutional questions.

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Overview

Christianity's presence in India stretches back to Akbar's court, but its expansion into the seven states of northeast India is a more recent and less examined story. Dr. Shailendra Kumar traces that arc from the colonial era through to the present, documenting not just the spread of conversion activity but the cultural displacement that accompanied it — the erosion of indigenous social structures, traditions, and identities across Assam, Manipur, Meghalaya, Mizoram, Nagaland, Tripura, and Arunachal Pradesh.

The book also raises questions about the constitutional framework: whether the special rights granted to religious minorities permit open and competitive proselytisation, and whether a democracy should allow the systematic targeting of specific communities for religious conversion. The role played by missionary activity in the 1857 uprising and the mechanisms of conversion used in the northeast are examined with equal attention to historical record and current practice.

For readers concerned with how religious change intersects with cultural survival and constitutional rights, Kumar's account is a detailed and documented entry point.

भारत में ईसावाद का अकबर के दरबार से प्रारम्भ1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका, और फिर आगे चलते हुए पूर्वोत्तर के सभी सातों राज्यों में धीरे-धीरे ईसावाद का प्रवेश और उसका समाज और संस्कृति पर विध्वंसक प्रभावलेखक ने एक भारत में ईसावाद की यात्रा का एक व्यापक वृत्त खींचा है। साथ ही पुस्तक ये भी प्रश्न उठाती है कि क्या हमारे संविधान के तहत अल्पसंख्यकों को दिए गए विशेष अधिकारों का दुरुप्योग नहीं हो रहा है? या फिर ये मान्यता कि संविधान समाज में अपने “मजहब” को प्रचारित करने की खुली छूट—खुली प्रतिस्पर्धा की छूट प्रदान करता है? और यदि ऐसा है, तो फिर क्या एक लोकतंत्र में ये अपेक्षित है?

Author

Dr. Shailendra Kumar

डॉ. शैलेन्द्र कुमार का जन्म बथनाहा, सीतामढ़ी, बिहार में हुआ हुआ। आरंभिक शिक्षा वहीं गाँव में ही हुई। बाद में बिहार विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक करके उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आ गए। आपने अनेक विषयों-विज्ञान, हिन्दी तथा रूसी भाषा व साहित्य, प्रबंधन, अर्थशास्त्र तथा संस्कृत, अंग्रेजी एवं स्पैनिश भाषाओं का अध्ययन किया है और दो बार स्नातक, चार बार परास्नातक और अंततः अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की है। आपको देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों-जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं भारतीय विदेश व्यापार संस्थान तथा ब्रिटेन के ससेक्स विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। वर्ष 1992 की सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करके आप केंद्रीय सचिवालय सेवा से जुड़े और भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों- वाणिज्य मंत्रालय, कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग, संघ लोक सेवा आयोग, आर्थिक मामले विभाग, स्वास्थ्य मंत्रालय, प्रसार भारती आदि में अनेक पदों पर कार्य करते हुए सम्प्रति वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। पिछले तीन दशकों से आप लेखन कार्य से जुड़े हुए हैं। आपका लेखन क्षेत्र व्यापक है। आप आर्थिक, भाषायी, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विषयों पर लिखते हैं। आजकल इब्राहिमी मजहबों पर भी लिख रहे हैं। सन 2000 में आपकी पहली पुस्तक "विश्व व्यापार संगठनः भारत के परिप्रेक्ष्य में" राजकमल द्वारा प्रकाशित हुई, जिसे दो राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। सन 2005 में अंग्रेजी में "Trade in Services: Advantage India" प्रकाशित हुई। इसके बाद विश्व व्यापार संबंधी दो पुस्तकों में आंशिक रूप से योगदान किया। ये पुस्तकें 2006 तथा 2007 में क्रमशः CENTAD-OXFAM तथा UNCTAD-ADB के तत्त्वावधान में प्रकाशित हुई। वर्ष 2015 में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर द्वारा भारत के सेवा व्यापार पर एक शोधलेख प्रकाशित हुआ। इनके अतिरिक्त आपके पचास से अधिक आलेख और आधा दर्जन कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी हाल ही में असम की सांस्कृतिक क्रांति तथा शौर्यगाथा पर केंद्रित आपकी पुस्तक "नामघर" प्रकाशित हुई है।

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