Bhoga Huaa Sach: Bharat me Islam-2

byVijay Manohar Tiwari

Medieval Islamic conquest of India documented through primary sources, alongside the rise of a global ex-Muslim intellectual movement.

Overview

The second volume of Vijay Manohar Tiwari's series on Islam in India picks up where medieval chronicles left off: the Tughlaq sultanate's campaigns across the subcontinent — massacres in Delhi and Bengal, the destruction of temples at Jagannath and Jwalamukhi, the Kampila campaign in Karnataka, loot carried as far as Damascus and Baghdad, and a hundred and eighty thousand enslaved — recorded not through polemical retelling but through the testimony of contemporary chroniclers including Ziauddin Barani.

Tiwari frames this historical account against a present-day phenomenon: a global community of ex-Muslims — from Pakistan, India, Europe, and the Arab world — now conducting open textual examination of the Quran and Hadith on platforms like YouTube, reaching audiences in the millions. Figures like Sahil, Sameer, Dr. Fauziya Rauf, and Zafar Heretic represent, in Tiwari's reading, a new class of intellectuals unwilling to be consumed by an ideology they have interrogated and found wanting.

Part historical document, part contemporary survey, the book asks what happens when a civilisation's victims begin to name what was done to them and why — and finds that the conversation is already under way, in multiple languages, across borders.

भारत में इस्लामी इतिहास और दुनिया भर में इस्लाम, एक आम दिलचस्पी के दायरे में आ गया है। लोग सच जानना चाहते हैं। वह सच जो छिपाया गया है। यकीन न हो तो यूट्यूब पर एक्स मुस्लिम साहिल, समीर, सचवाला, अलमोसो फ्री, डॉ. फौजिया रऊफ, अमीना सरदार, हारिस सुल्तान, गालिब कमाल, महलीज सरकारी, सना खान, यास्मीन, जफर हेरेटिक, कोहराम, सलीम अहमद नास्तिक को टटोल लीजिए। ये सब अरब और यूरोप से लेकर पाकिस्तान और भारत तक फैले हुए प्रबुद्ध लोगों की नई जमात हैं। विस्तारवादी इस्लाम के विभिन्न आयाम और असर पर इस जमात में जमकर शास्त्रार्थ चल रहे हैं। लाखों की फॉलोइंग वाले ये सब इस्लाम के स्वतंत्र बुद्धि के अवतार हैं, जो इस्लामी अतीत और अपनी जड़ों में झाँक रहे हैं और कुरान और हदीसों पर खुली चर्चा कर रहे हैं। ये ऐसे हिम्मतवर लोग हैं, जो अब किसी बंजर विचार का ईंधन बनकर राख होने के लिए तैयार नहीं हैं! भाग-2 Contents ✍ दिल्ली में हिंदुओं का नरसंहार ✍ तेलंगाना ने तुगलक को खदेड़ा ✍ बरन के किले पर हिंदुओं के कटे हुए सिर ✍ ईद के तोहफे में हिंदू राजाओं की बंदी बेटियां ✍ 13 हजार बैलों पर लादकर सोना लाया! ✍ हिंदुओं ने किया तुगलक की फौज का सफाया ✍ महल के बाहर कत्ल के चबूतरे, जल्लाद तैनात ✍ दक्षिण भारत में काफिरों के कत्लेआम ✍ कर्नाटक में पहला जौहर, कम्पिला तबाह ✍ दमिश्क और बगदाद तक दिल्ली की लूट के चर्चे ✍ खलीफा के नाम पर लुटाया खजाना ✍ सूफी को मानव मल पिलाया, शेखों के कत्ल ✍ हिंदू मां की कोख से पैदा हुआ तीसरा तुगलक ✍ बंगाल में 1 लाख 80 हजार कत्ल ✍ जगन्नाथ और ज्वालामुखी मंदिर तबाह ✍ पांडवों की लाट दिल्ली में ✍ काफिर मुर्दाबाद, इस्लाम जिंदाबाद ✍ धर्मांतरित हिंदू बना ताकतवर वजीर ✍ कुएं में दफन रेवाड़ी की अकूत दौलत ✍ जियाउद्दीन बरनी से सवाल-जवाब ✍ एक लाख अस्सी हजार गुलाम ✍ तैमूर की कलम से ✍ दिल्ली के पास एक लाख हिंदुओं की हत्या ✍ मेरठ से जम्मू तक फसाद ✍ लोनी का करतार, दिल्ली का ब्राह्मण ✍ गुनाहों के रोजनामचे

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Vijay Manohar Tiwari

About the Author विजय मनोहर तिवारी ने पच्चीस साल प्रिंट और टीवी में खपाए हैं। खबरों की खंती में खुदाई का काम, जिससे टिकाऊ ज्यादा कुछ नहीं निकलता। लेकिन किताबों के हिंदी पाठकों की दरिद्रता के कारण चूल्हा जलाने के लिए मीडिया की मनरेगा का जाॅब कार्ड जरूरी था। खबरों के सिरे पकड़कर भटकने के शौक में छह-सात किताबें निकलीं। इनकी बदौलत मिले पुरस्कार-सम्मान बक्सों में रखे हैं। सबसे बड़ा सम्मान उस कहानी को मानते हैं, जिसमें कथाकार कमलेश्वर ने उन्हें एक किरदार बनाकर पेश किया था। यह बिजली के लिए बड़े बांध में डूबे एक कस्बे की दास्तान है, जिस पर टीवी के लाइव कवरेज पर केंद्रित किताब 'हरसूद 30 जून' साल 2005 में छपी थी। गैस हादसे में भोपाल में 15 हजार लाशें गिरी थीं, लेकिन लिखा न के बराबर गया। हादसे की पच्चीसवीं बरसी पर खबरों से ही निकली किताब है-'आधी रात का सच।' इसके अलावा 'प्रिय पाकिस्तान', 'एक साध्वी की सत्ता कथा' और 'राहुल बारपुते' दीगर किताबें हैं। ठहराव को खतरनाक मानते हैं इसलिए लगातार डोलते रहे हैं। भारत की सघन आठ परिक्रमाओं के दौरान ट्रेनों में लिखी किताब है-'भारत की खोज में मेरे पाँच साल।' दो-एक संस्करणों के बाद ये किताबें बाजार से लुप्त हैं। नश्वर संसार के सारे पते अस्थाई हैं। संपर्क के लिए ईमेल और आभाषी दुनिया है, लेकिन फेसबुक और ट्विटर पर तफरीह उतनी ही है, जितना सरकारी दफ्तरों में साहबों की मौजूदगी या शपथ के बाद सदन में माननीयों की पावन उपस्थिति। दो-तीन और किताबों ने उलझाया हुआ है। इनमें मीडिया के अनुभवों का जखीरा ज्वलनशील होगा। समय का हर टुकड़ा कीमती है। कौन जाने दुष्ट कोरोना कब घात लगा दे। काफिरों को अल्लाह बचाए...

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