Bachpan Ki Kahaniyan

bysoumitri

Thirteen Hindi stories in which children's sharp perception quietly outmanoeuvres the adult world around them.

Overview

Children in these thirteen stories do not behave the way adults expect children to behave. They speak back with inconvenient precision, solve problems through lateral logic, and notice things that the grown people around them have long since stopped seeing. Soumitri's collection — written entirely in Hindi — draws its energy from that gap between what adults think childhood is and what children themselves actually experience.

The stories move between school corridors, train journeys, festival evenings, and neighbourhood streets. One turns on a student's accidental revelation about a teacher's family; another follows a child who stays awake through the night making a rangoli out of guilt and care; a third plays comic mischief with English homophones in a way that exposes the anxieties of language instruction. The dialogue throughout is sharp and often funny — the kind of thing that sounds improvised but has been worked at.

Soumitri wrote these stories over years, and several were available individually on digital platforms before being gathered here. What the collection provides that the individual stories do not is the cumulative sense of a world seen clearly from a very particular angle — childhood not as innocence but as a distinct mode of attention.

ABOUT THE BOOK: कहानियों के मुख़्य पात्र बच्चे हैं। ये कहानियाँ बच्चों के अद्भुत मानसिक उत्कृष्टता को दर्शाती हैं। सारी कहानियाँ काल्पनिक हैं । इस पुस्तक के सात कहानियों के कुछ संवाद: "सर सुना है मैडम के सात बच्चे हैं फिर आठवें के लिए आप इतने परेशान क्यों " - भ्रम और सच्चाई "लगा जैसे मैंने तुम्हारी कोई मदद नहीं की इसलिए रात जागकर रंगोली बना डाली " - लकड़ी की सीढ़ियाँ "जानते हो आज मैंने क्या लाया है " - टाटा मद्रास का ट्रेन सफ़र "बच्चों घबराओ मत पर्दा गिरा तो क्या नाटक चालु " - पर्दा गिरा पर नाटक चालु "सर ये अंग्रेज़ी के श्रुतिसम भिनार्थक शब्द है " - मार्च का मार्च "क्या करूँ खोमचेवालों से आइसक्रीम ख़रीदने को डर लगता है " - मेहनत का ठंडा फल "लगता है आज तिलकवाती ने फिर स्कूटर चलायी है " - तिलकवाती से बच के चक्रपाणि कानन ने तेरह कहानियों का संकलन बनाया है। सारी कहानियाँ हिन्दी में लिखी हुई हैं। पहली पाँच कहानियाँ amazon India में उपलब्ध हैं। छँटवी कहानी amazon KDP के eBook में उपलब्ध है।

Author

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श्री चक्रपाणी कन्नन का जन्म दक्षिण भारत के विरुदुनगर शहर में हुआ। जन्म के बाद से उनके जीवन का अधिकांश भाग जमशेदपुर शहर, झारखण्ड (तत्कालीन बिहार राज्य) में बीता। इनके पिता टाटा कंपनी में कार्यरत थे अतः इनका सारा परिवार इसी शहर में रहने लगा। उन्होंने जमशेदपुर के XLRI से बिज़नस मैनेजमेंट (PGDBM), रांची विश्वविद्यालय से B.Com और Tata Institute से डिप्लोमा इन मैकेनिकल इंजीनियरिंग किया है। इन्होंने अपनी नौकरी की शुरुआत टाटा कंपनी से की। इसके बाद सऊदी अरब, चेन्नई और दुबई में अलग-अलग कम्पनियों में कार्यरत रहे। नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद अब अपने बच्चों के साथ रह रहे हैं।बचपन से ही दोस्तों और सहकर्मियों के साथ छोटी घटनाओं को रोचक तरीके से कहना, ड्रामों में हिस्सा लेना, अपने बच्चों को रोज एक नई कहानी सुनाना इत्यादि इनके शौक का हिस्सा थीं। आज की तनाव पूर्ण जीवन शैली में तत्कालीन हास्यास्पद किस्सों की बातें आपको भी गुदगुदा जाएंगी। भाषा शैली के साथ साथ इनकी कहानियों में आपको तत्कालीन संस्कारों और खान पान की भी झलक मिलेगी, जिनके समावेश से इनकी कहानियां प्रेरणादायक होने के साथ साथ चटपटी भी बन पड़ी हैं। कहानियों के इस संकलन के माध्यम से इन्होंने पाठकों के लिए मनोरंजक और ज्ञानवर्धक साहित्य सृजन किया है। ये "सौमित्री उपनाम से कहानियां लिखते हैं। इन कहानियों में इन्होंने अपने दोस्तों के साथ बिताए गए बचपन के कुछ यादगार पलों को काल्पनिकता का प्रयोग करते हुए कहानियों का रूप दिया है। कहानियों में कुछ त्रुटियां हो सकती हैं जिनके लिए लेखक क्षमा प्रार्थी है।

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