-:किताब के बारे में:-
प्रकृति प्रेम की उदात्त भावनाओं का जागरण, हृदय वेदी पर विराजमान अहिंसा देवता की आराधना में समर्पित कवि का भाव कविता बनकर प्रकट हुआ।
प्रकृति और पर्यावरण – प्रकृति माँ के विभिन्न अंगों-उपांगों, आदर्शों की उपासना करते हुए यह काव्यधारा पर्यावरण की ओर प्रवाहित हुई जिसमें– “दया विशुद्ध धर्मो”, “धर्मस्य मूल दया एवं अहिंसा प्रथमों धर्मः” सूत्रों को प्राण प्रतिष्ठित किया। वहीं पर पट्टकाय जीवों की रक्षा का विधान भी दर्शाया गया। जिस प्रकृति माँ की गोद में हम जीवन जीते हैं उसके प्रति कृतज्ञता पूर्वक हम क्या कर पाते हैं? और जिस पर्यावरण के बिना हमारा जीवन असम्भव है उस पर्यावरण को हम कितना सुरक्षित रख पाते हैं। इन विविध विचारों का, समस्याओं का सम-सामायिक सापेक्ष समाधान भारतीय संस्कृति, सभ्यता, समाजशास्त्र, परिवेश के अनुसार इसमें संक्षेप रूप में दिया गया है।
यह सब परम पूजनीय श्री विरागसागर जी गुरुदेव की कृपा है आचार्य भगवान श्री विशुद्धसागर जी के आशीर्वाद का फल है एवं समग्र संघ के सहयोग का सुफल है। इस महायज्ञ के प्रारम्भ में श्री गुरुदेव विरागसागर जी ने अपने सिद्ध हस्तकमलों से ॥ ओम् ॥ लेखन कर प्रारम्भ किया, आशीर्वाद दिया। प्रो. श्रीमती मंजू पाटनी ने यथाविधि शब्द संशोधन किया।
सक्रम विषय निवद्ध कर सुन्दर स्वरूप प्रदानकर सुरुचि पूर्ण पठनीय बनाया। श्रमण शुद्धात्मसागर जी का श्रुत सेवाभाव प्रशंसनीय है।
डॉ. अनुपम जैन के निर्देशन में पर्यावरण पर विद्वत संगोष्ठी हुई। प्राप्त सम्मतियाँ परिशिष्ट में संलग्न हैं। मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम से एवं आचार्य विभवसागर श्रुत संस्थान के योगदान से प्रकाशित होने वाला यह पर्यावरण महाकाव्य अखिल विश्व में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को दूर कर विशुद्ध पर्यावरण में जीवन जीने की प्रेरणा भरेगा। प्राणी मात्र का कल्याण करेगा। विश्व कल्याणकारी साहित्य की श्रेणी में अपना श्रेष्ठतम महत्व स्थापित करेगा। संस्कृति और समाज के लिए सदा-सदा उपयोगी रहेगा।
पुस्तक प्रकाशक ज्ञानदानी दानवीर श्री जयेश जसवत लाल जी शाह गोरेगांव मुंबई के लिए आशीर्वाद।
प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोगी एवं पाठकों के लिए, शुभाशीर्वाद।
– श्रमणाचार्य श्री विभवसागर जी